शनिवार, 2 अक्टूबर 2010
अयोध्या विवाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय: एक इतिहासकार की दृष्टि से रोमिला थापर( ‘हिन्दू’ में 2/10/2010 को प्रकाशित लेख का हिन्दी रूपान्तर)
रविवार, 30 मई 2010
हिन्दुत्ववादी आतंकवाद का पर्दाफ़ाश
संपादकीय, २२ मई,२०१०. ई पी डब्ल्यू
हिन्दुत्ववादी आतंकवाद का पर्दाफ़ाश
साम्प्रदायिक दुराग्रहों ने आतंकवाद के विरुद्ध हमारे संघर्ष को कमज़ोर कर दिया है
मालेगांव में सितम्बर २००६ में हुए बम धमाकों में जब एक स्थानीय मस्जिद के बाहर जुमे की नमाज़ अदा करने के लिए एकत्रित लोगों में से ४० मारे गए और उनसे भी अधिक घायल हुए तो पहली गिरफ्तारियां कुछ मुस्लिम व्यक्तियों की हुईं जिन्हें लश्कर-ए-तैयबा (LET) और और स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ इंडिया (SIMI) से जुड़ा हुआ बताया गया. एक साल भी नहीं बीता था कि मई २००७ में हैदराबाद की मक्का मस्जिद में एक वैसा ही बम विस्फोट हुआ जिसमें ९ लोग मारे गए. पुलिस के अनुसार वे "परिष्कृत" बम थे जिनका विस्फोट बांग्लादेश स्थित सेलफोन से किया गया था और मुख्य अभियुक्त हरक़त-उल-जिहाद अल इस्लामी (HUJI) से जुड़े एक मुस्लिम व्यक्ति को बताया गया. पुलिस ने मनमाने तरीके से शहर के कुछ मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया और उन्हें यंत्रणा देकर उनसे "अपराध" की स्वीकारोक्ति भी करा ली. ६ महीने बाद ही राजस्थान की अजमेर शरीफ दरगाह में रमज़ान के आख़िरी जुमे के दिन हुए धमाके के लिए एक बार फिर "जिहादी आतंकवादी" ज़िम्मेदार बताये गए.
महाराष्ट्र पुलिस के आतंकवाद निरोधक दस्ते (ATS) के मुखिया हेमंत करकरे की सभी उपलब्ध सुरागों की तफ्तीश करने की सहज-सरल परन्तु साहसपूर्ण कार्यवाही के चलते मालेगांव बम धमाकों से हिन्दुत्ववादी गुटों का सम्बन्ध उजागर हो गया. इस अकेली कार्यवाही के बिना ऐसे ही अन्य सारे सम्बन्ध शायद हमारे सुरक्षा प्रतिष्ठान द्वारा परोसे गए झूठों और अर्धसत्यों के पीछे दबे रह जाते. जैसा कि अब सभी जानते हैं इस हमले की योजना "अभिनव भारत" नामके एक गुट नें बनाई थी. इस गुट में कुछ धार्मिक हस्तियों के अतिरिक्त भारतीय थलसेना का एक सेवारत अधिकारी भी शामिल है. नांदेड, भोपाल, कानपुर और गोवा में बम बनाने के मामलों में हिन्दुत्ववादी गुटों के शामिल होने के और भी मामले खुले हैं. इनमें से अधिकाँश बजरंग दल से जुड़े हैं जो आर एस एस का ही एक अनुषांगिक संगठन है. बम धमाकों की श्रंखला से आर एस एस और इसके अनुषांगिक संगठनों और व्यक्तियों का सम्बन्ध अब जगजाहिर है. और यह उस दूसरे और पुख्ता सबूतों के अतिरिक्त है जो बीसियों साम्प्रदायिक नरसंहारों में इस भयावह संगठन की संलिप्तता की पुष्टि करते हैं; गुजरात में २००२ में हुआ दंगा जिनका नवीनतम और सबसे बड़ा उदाहरण है.
भारत में धार्मिक कट्टरवाद से उपजे आतंक का अगर कोई एक स्रोत है तो वो है आर एस एस. इसके छोटे भाई-बंधू इस्लामी, सिख या ईसाई कट्टरपंथी भी यद्यपि अपने-अपने तरीके से खतरनाक हैं परन्तु वे आर एस एस व इससे जुड़े संगठनों व व्यक्तियों- के संगठनात्मक संजाल,आर्थिक मजबूती, और राजनीतिक वैधता के मुकाबले में कहीं नहीं ठहरते. और जो भी हो भारत का सबसे बड़ा विपक्षी दल भी आर एस एस की शत प्रतिशत अधीनस्थ शाखा ही तो है; और इस "परिवार" की उग्र साम्प्रदायिक राजनीति ने देश में ऐसा राजनीतिक माहौल बना दिया है जिसमें कोई भी आतंकवादी कृत्य सबूतों की परवाह किये बिना मुस्लिमों से जोड़ दिया जाता है.
इसके बावजूद, मुस्लिम समुदायों के बीच इस्लामी कट्टरपंथ का उदय एक गंभीर मसला है.खुद मुस्लिमों पर भी इसके प्रतिगामी सामाजिक और राजनीतिक प्रभावों के अतिरिक्त इसके और भी घातक परिणाम संभावित हैं और इसके विरुद्ध जुझारू संघर्ष चलाने की आवश्यकता है. इस्लामी कट्टरपंथियों ने न केवल भारत अपितु पूरी दुनिया में आतंकवादी संगठनों की स्थापना और पालन-पोषण किया है और हिंसक कार्यवाहियां की हैं. इन में से किसी भी तथ्य को न तो नकारा जा सकता है न ही इस्लामी कट्टरपंथ और आतंकवाद के विरुद्ध चौकसी में ढील दी जा सकती है.
फिर भी, यह तो अब बिलकुल स्पष्ट हो चुका है कि हमारी सुरक्षा एजेंसियां, सरकारी संस्थाएं, और मंत्रालय विशेषरूप से गृहमंत्रालय साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह से बुरी तरह ग्रस्त हैं. ऊपर उद्धृत सभी मामलों में, और अन्य भी कई मामलों में सारे फोरेंसिक और परिस्थितिजन्य साक्ष्य हिन्दुत्ववादी गुटों की सांठ-गाँठ की और संकेत करते पाए गए. फिर भी सारे साक्ष्यों की उपेक्षा करते हुए और बिलकुल साफ़-साफ़ सुरागों को दरकिनार करते हुए उन्होंने जिहादी आतंकवाद की सांठ-गांठ की कहानियाँ गढ़ीं ; मनमाने तरीके से कुछ मुस्लिम पुरुषों (और कुछ महिलाओं को भी) उठा कर उन्हें तब तक यंत्रणा देते रहे जब तक की उन्होंने अपना "अपराध" स्वीकार नहीं कर लिया और अंत में केस हल करने में सफलता का दावा करने लगे. अभी हाल में ही इसी जनवरी में ही जबकि मालेगांव से हिन्दुत्ववादी आतंक के तार जुड़े होने की पुष्टि हो चुकी थी और राजस्थान पुलिस अजमेर धमाके के अभियुक्तों से मक्का मस्जिद में रखे गए बमों से उनके सम्बन्ध के बारे में पूछताछ शुरू कर चुकी थी; उसी समय हैदराबाद पुलिस खुशी-खुशी कुछ मुस्लिमों को गिरफ़्तार कर रही थी जिनके बारे में उसका दावा था कि उनका सम्बन्ध २००७ में मक्का मस्जिद में हुए धमाकों से था. सोहराबुद्दीन शेख़, उसकी पत्नी, इशरत जहां, और उसके मित्रों की ह्त्या में गुजरात, राजस्थान, और आंध्र प्रदेश पुलिस की मिलीभगत अब पूरी तरह से साबित हो चुकी है. दिल्ली के बटाला हाउस मुठभेड़ जैसे मामलों में भी पुलिस के साम्प्रदायिक दुराग्रह और गलत कारनामों के प्राथमिक साक्ष्य भी सामने आ चुके हैं. दुर्भाग्य से ऐसे मामलों की सूची जिनमें पुलिस और सुरक्षा प्रतिष्ठान के साम्प्रदायिक दुराग्रह के प्रमाण मिलते हैं इतनी लम्बी है कि कई पोथियां भरी जा सकती हैं.
यद्यपि जाति और लिंग संबंधी पूर्वाग्रहों और भेदभावों को पहचान कर उनके समाधान कि दिशा में कुछ प्रयास किये गए हैं, धार्मिक अल्पसंख्यकों-विशेषकर मुस्लिमों के विरुद्ध भेदभाव और पूर्वाग्रहों को पहचान कर उन्हें निर्मूल करने के बारे में एक खास तरह की जिद और हठधर्मी ही देखने में आती है. यू पी ए गठबंधन की मौजूदा सरकार ने सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्टों के प्रकाश में कुछ स्वागत योग्य कदम उठाये तो हैं. इनके माध्यम से भारत के मुस्लिमों के विरुद्ध संरचनात्मक भेदभाव और पूर्वाग्रहों और उनके निर्मूलन के बारे में सवाल भी उठने लगे हैं.ये भी सच है कि हिन्दुत्ववादी गुटों और बम धमाकों का आपराधिक रिश्ते का खुलासा भी इसी गठबंधन के शासनकाल में हुआ है. फिर भी इतना भर पर्याप्त नहीं है; हमारे पूरे सुरक्षा प्रतिष्ठान को साम्प्रदायिक वायरस से मुक्त कराने के लिए अविलम्ब कदम उठाए जाने की आवश्यकता है. पर ये अभी देखना है कि वर्तमान गृहमंत्री, पी चिदम्बरम खुद को इस कार्य के लिए सक्षम सिद्ध कर पाते हैं या नहीं और कांग्रेस पार्टी प्रशासन और राज्य के ढाँचे में घर बना चुके हिंदुत्व से दो-दो हाथ करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति जुटा पाती है या नहीं.
मंगलवार, 13 अप्रैल 2010
देशभक्ति की बाढ़
मंगलवार, 9 मार्च 2010
तसलीमा नसरीन और मक़बूल फ़िदा हुसैन
शनिवार, 10 अक्टूबर 2009
प्रेत की वापसी
प्रेत फिर दिखने लगा है। उस सनकी दढ़ियल ने 150 साल पहले एक प्रेत के आंतक की घोषणा की थी।और तभी से सारे सयाने और ओझा मिर्च की धूनी और नीम के झाड़ू से लेकर बड़े-बड़े तोप-तलवार और बम तक ले कर उस प्रेत के विनाश के प्रयास में जुटे हुए हैं। कामयाबी नहीं मिली तो मन्त्रों और झाड़-फूंक का सहारा लिया गया। और एक बार तो लगा कि जैसे प्रेत वापस गया बोतल में। दुनिया भर के अघोरी और प्रेत-पूजक दावे करते थे कि प्रेत तो सामाजिक इतिहास का हिस्सा है और उसे ऐतिहासिक प्रक्रिया से अलग नहीं किया जा सकता। सयानों ने उपाय निकाला। उन्होंने इतिहास के ही अन्त की घोषणा कर दी। न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी।
कुछ दिन अमन-चैन भी रहा(यूं न था मैंने फ़क़त चाहा था यूं हो जाये) प्रेतोपासकों में से कुछ तो बाकायदा राम-राम जपने भी लगे। जिन्होंने नहीं भी जपा उन्होंने भी आंगन में तुलसी का पौधा तो रोप ही लिया और सुबह शाम उस पर जल चढ़ाने लगे। सुग्रीव और विभीषण के राजतिलक हुए; उन्हें पुरस्कृत भी किया गया। कुछ अन्य भी थे जो देखने में तो लंकेश-मित्र बालि जैसे लगते थे पर जब भी अवसर आया उन्होंने सीना चीर कर दिखा दिया कि उनके हृदय में तो राम ही बसते हैं और उनकी गदा अगर उठेगी तो राक्षसों के विरुद्ध वरना तो वे रामजी के फ़लाहारी चाकर मात्र हैं। लगने लगा अब तो मोरचा फ़तह हो गया। लंका मे राम-राज आ गया।
‘अब मैं काह करूं कित जाऊं’ गुनगुनाते पाये जाते हैं।
शनिवार, 7 फ़रवरी 2009
बाढ़ की सम्भावनायें सामने हैं
‘बाढ़ की सम्भावनायें सामने हैं
और नदियों के किनारे घर बने हैं।‘
कई दिनों से दुष्यन्त की ये पंक्तियां मन में घुमड़ रही हैं। और बदली जब घुमड़ेगी तो देर-सबेर बरसेगी भी ज़रूर। लगता है आज बारिश होगी।
मंगलौर की दुर्घटना को ले कर द्र्श्य मीडिया में और ब्लॉग जगत में भी ख़ूब हलचल मची हुई है। हमारे टी वी चैनेल तो अधिकतम फ़ुटेज श्रीराम सेने और उसके कार्यकर्ताओं को देते हुए और उनकी आलोचना के बहाने से ही सही उन्हें इतना प्रचार दे रहे हैं जिसकी स्वयम उन्होंने भी कल्पना नहीं की होगी। कुछ दिन पहले मुम्बई में हुए आतंकवादी हमले के दौरान भी यही देखने में आया था। ‘ताज’ होटल से बच कर निकलती एक बदहवास, डरी और घबराई हुई महिला के पीछे एक पत्रकार कैमरा-माइक लेकर पड़ गया और उससे कुछ मसालेदार ‘न्यूज़’ उगलवाने के प्रयास में काफ़ी देर तक लगा रहा। उस आतंक को इतना प्रचार-प्रसार इस मीडिया के माध्यम से मिला कि शायद उसके सूत्रधारों के सारे मनोरथ सफ़ल हो गये होंगे।
परन्तु इस आलेख का उद्देश्य मीडिया पर हमला करना नहीं है जो अक्सर ही लोकतान्त्रिक मूल्यों की दुहाई देते-देते फ़ासिस्ट प्रतिगामी शक्तियों के हाथों का चेतन या अचेतन मोहरा बन जाता है। मन्तव्य है मंगलौर, मुम्बई जैसी घटनाओं और हादसों के निहितार्थों की ओर संकेत करना।
ज़रा एक निगाह डालें ऐसी घटनाओं के पात्रों की वर्गीय प्रष्ठभूमि पर। अधिकांश मामलों में हमलावर बेरोज़गार/अर्द्ध बेरोज़गार ‘लुम्पेनाइज़्ड’ नौजवान या अधेड़ होते हैं जो इस सामाजिक ढाँचे में अपने लिये एक ‘स्पेस’ बनाने का प्रयास कर रहे होते हैं या बना चुके होते हैं और उसकी निरन्तरता सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहे होते हैं। मंगलौर के श्रीराम सेने के कार्यकर्ता हों, अयोध्या-काण्ड के कारसेवक,अहमदाबाद और उड़ीसा के हत्यारे जनसमूह या तालिबानी आतंकवादी कसाब और अन्य – इन सभी की सामाजिक-आर्थिक प्रष्ठभूमि एक जैसी ही होती है। संस्कृति, हिन्दुत्व, इस्लाम या ऐसे ही अन्य नारे भले ही अलग-अलग या परस्पर विरोधी भी नज़र आयें पर नारों के नाम पर मारपीट/मारकाट करने वालों की प्रष्ठभूमि यही होती है। हिटलर के ‘ब्राउन शर्टस’ गिरोहों में भी यही लोग शामिल हुआ करते थे।
इतिहास गवाह है कि यदि समकालीन सामाजिक व्यवस्था और संस्थाओं से जनता का मोह-भंग हो जाता है तो समाज एक दोराहे पर आकर खड़ा हो जाता है।एक रास्ता जाता है जनवादी मानवीय सामाजिक व्यवस्था की स्थापना की ओर। पर इस रास्ते पर आगे बढ़ सकने के लिये आवश्यक है समाज में प्रगतिकामी जनवादी तत्व पर्याप्त रूप से सचेतन, सशक्त, समर्थ और सक्रिय हों। तभी व्यवस्था के अन्तर्निहित विरोधाभासों से उपजे जनाक्रोश को एक क्रान्तिकारी, प्रगतिशील दिशा दी जा सकती है। दूसरा रास्ता ख़तरनाक है। यदि जनवादी प्रगतिकामी शक्तियाँ अनुपस्थित,अक्षम अशक्त या निष्क्रिय होती हैं तो सामाजिक शून्य को भरने का काम करती हैं जनविरोधी, अमानवीय फ़ासीवादी शक्तियाँ।
पहले रास्ते का उदाहरण क्यूबा में देखा जा सकता है जहां जनवादी क्रान्तिकारी शक्तियों ने साम्राज्यवादी कठपुतले बतिस्ता को हटा कर राजसत्ता पर कब्ज़ा कर लिया और पूरे देश और समाज को मानव-मुक्ति के पथ पर अग्रसर कर दिया। कुछ पहले यही काम चीन में भी हो चुका था।दूसरे ख़तरनाक विकल्प के उदाहरण भी कई हैं। हिटलर का जर्मनी, फ़्रैंको का स्पेन, पिनोशे का चिली, इण्डोनेशिया……यह सूची और भी लम्बी हो सकती है।
उपरोक्त ऐतिहासिक अनुभवों के प्रकाश में भारत के समकालीन सामाजिक-राजनैतिक
परिद्रश्य पर एक निगाह डालना असंगत न होगा।
वर्तमान सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्था और संस्थाओं से मोहभंग के लक्षण दिन-प्रतिदिन और भी मुखर होते जा रहे हैं। बेरोजगारों की बढ़ती संख्या नौजवानों को या तो धार्मिक उन्माद की ओर धकेल रही है या सीधे-सीधे अपराध की ओर। काँवरियों, जागरणो,धार्मिक महन्तों के प्रवचनों में कुछ वर्ष पहले तक अधेड़-अवकाश प्राप्त बुज़ुर्गों का बहुमत होता था। अब एक बड़ी संख्या नई उम्र के नौजवानों की होती है। इनमें से ही एक हिस्सा बजरंगदल, श्रीराम सेने, जैसे तथाकथित धार्मिक-सांस्कृतिक संगठनों की ओर मुड़ रहा है और दूसरा हिस्सा संगठित अपराध और आतंकवादी गतिविधियों की ओर।
क्रांति के द्वारा व्यवस्था परिवर्तन की बातें करने वाले दल और संगठन भी जाने-अनजाने इसी व्यवस्था का एक हिस्सा बन चुके हैं और उनकी सारी लड़ाई इसी व्यवस्था में अपने लिये एक कोना सुरक्षित बनाए रखने के प्रयासों तक सीमित रह गई है। क्रांति की कसमें खाने वाले ‘कम्युनिस्ट’ दलों को भी उनके आचरण के चलते अधिक से अधिक सामाजिक जनवादी ही कहा जा सकता है जो अर्थवादी लोकलुभावन नारे जोर-शोर से लगाते रहते हैं और जिन्हें भृष्टतम घोर प्रतिक्रियावादी शक्तियों के साथ उठने-बैठने में कोई भी संकोच नहीं होता यदि उन्हें ‘बैकसीट ड्राइविंग’ के सुख के साथ कुछ पद्मभूषण, पद्मविभूषण जैसे लॉलीपॉप मिलते रहें। क्रांति और सामाजिक परिवर्तन तो शायद उनके एजेण्डे से ही ग़ायब हो चुके हैं।
इस परिदृश्य में सामाजिक सरोकारों वाले सचेतन प्रगतिकामी लोगों पर एक बड़ी ज़िम्मेदारी आ जाती है कि समाज को प्रतिक्रियावाद की खाई में गिरने से बचाते हुए उसके ऐतिहासिक गन्तव्य की ओर अग्रसर करने में प्रभावी भूमिका निभाई जाय। यह कार्य एक दिन में किसी एक व्यक्ति के द्वारा नहीं किया जा सकता। मेरा विश्वास है कि एक बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो वर्तमान घटनाक्रम से असन्तुष्ट हैं और समाज को और बेहतर, और अधिक जनवादी और मानवीय देखना चाहते हैं। ये सभी लोग अपने-अपने तरीके से इस दिशा में प्रयास भी कर रहे हैं। यदि इन वैयक्तिक प्रयासों को सामूहिक, संगठित, और सुनियोजित किया जा सके तो निश्चय ही एक शोषण-विहीन समाज का लक्ष्य कुछ और करीब आ सकेगा। यह आलेख भी इसी दिशा में एक छोटा सा कदम है।