शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

अयोध्या विवाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय: एक इतिहासकार की दृष्टि से रोमिला थापर( ‘हिन्दू’ में 2/10/2010 को प्रकाशित लेख का हिन्दी रूपान्तर)


  यह निर्णय एक राजनीतिक फ़ैसला है जिसे तो राज्य ही बरसों पहले ही ले सकता था। इसमें पूरा ध्यान भूमि के स्वामित्व और ध्वस्त की गई मस्जिद के स्थान पर एक नया मन्दिर बनाने पर केन्द्रित रखा गया है। समस्या के मूल में था समकालीन राजनीति में कुछ धार्मिक हस्तियों की घुसपैठ का मामला परन्तु दावा यह भी किया जा रहा था कि इस सम्बन्ध में ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध हैं. इस ऐतिहासिक प्रमाण वाले पक्ष का उल्लेख तो हुआ परन्तु निर्णय देते समय उसकी पूरी तरह से उपेक्षा ही की गयी. 
     न्यायालय ने घोषणा की है की भूमि के एक सुनिश्चित टुकड़े पर ही एक दैवीय अथवा अर्द्ध दैवीय व्यक्तित्व का जन्म हुआ था जहां उस जन्म के उपलक्ष्य में एक नए मंदिर का निर्माण होना है. यह कहा गया है हिन्दू आस्था और विश्वास की अपील के जवाब में. कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध न होने के कारण  किसी विधिक न्यायलय से ऐसे निर्णय की अपेक्षा नहीं की जाती.एक देवता के रूप में राम में हिन्दुओं की गहरी आस्था है पर क्या मात्र इसी आधार पर जन्मस्थान के दावों, भूमि के स्वामित्व, और भूमि पर कब्ज़े के लिए जानबूझ कर एक ऐतिहासिक स्मारक को ध्वस्त किये जाने के बारे में कोई कानूनी फैसला लिया जा सकता है
     निर्णय में दावा किया गया है कि वहां १२ वीं शताब्दी का एक मंदिर था जिसे मस्जिद बनाने के लिए तोड़ा गया था- अतः नया मंदिर बनाने की वैधता स्वयंसिद्ध है. भारतीय पुरातत्व विभाग के खनन कार्य और उससे निकाले गए निष्कर्षों को उनकी समग्रता में स्वीकार कर लिया गया है जबकि अन्य पुरातत्ववेत्ता और इतिहासविद उनसे सहमत नहीं हैं. ऐसे विषय में व्यवसायिक निपुणता और दक्षता की आवश्यकता होती है। इस बारे में विशेषज्ञों के बीच में गहरे मतभेद होने के बावजूद किसी एक पक्ष के दृष्टिकोण को ही अत्यन्त सरलीकृत तरीके से स्वीकार कर लिये जाने के कारण इस निर्णय पर सहज ही भरोसा नहीं जमता। एक न्यायाधीश का कथन था कि उन्होंने ऐतिहासिक पहलू पर ग़ौर नहीं किया क्योंकि वे कोई इतिहासवेत्ता नहीं हैं पर उन्होंने आगे चल कर यह भी कहा कि इन मुकदमों पर निर्णय करने के लिये इतिहास और पुरातत्व की आवश्यकता नहीं है। और यह तब जब कि विचाराधीन मुद्दे ठीक वही हैं अर्थात दावों की ऐतिहासिकता और पिछली सहस्त्राब्दी की ऐतिहासिक इमारतें।
    एक विशिष्ट राजनीतिक पक्ष के नेतृत्व के आह्वान पर भीड़ ने लगभग 500 वर्ष पुरानी ऐसी मस्जिद को जानबूझ कर ध्वस्त कर दिया जो हमारी साँस्कृतिक विरासत का हिस्सा थी। अदालती फ़ैसले के सारांश मे कहीं भी इस बात की चर्चा नहीं है कि इस निरंकुश ध्वंस और हमारी विरासत के विरुद्ध इस अपराध की भर्त्सना की जानी चाहिये। नये मन्दिर का गर्भ-गृह- राम का अनुमानित जन्मस्थान-वहीं होगा जहां मसजिद का मलबा पड़ा है। जहां एक अनुमानित मन्दिर के ध्वंस की निन्दा की गई है और इसी कारण एक नये मन्दिर के निर्माण को उचित ठहराया गया है, मस्जिद के ध्वंस की कोई निन्दा नहीं की गई है और सुविधा के लिये उसे विचारणीय विषयों के दायरे से बाहर ही रखा गया।
एक मिसाल
     इस फ़ैसले ने अदालतों के लिये एक नज़ीर भी कायम कर दी है कि कोई भी समूह जो स्वयम को एक समुदाय बताता हो अपने द्वारा पूजित किसी भी दैवीय या अर्द्ध दैवीय व्यक्तित्व का जन्मस्थान बता कर ज़मीन के किसी भी टुकड़े पर दावा कर सकता है। अब से जहां भी कोई काम का भूखण्ड दिखेगा, या कोई विवाद उत्पन्न किया जा सकेगा; ऐसे कई जन्मस्थान सामने आयेंगे। और चूंकि एक एतिहासिक स्मारक को ध्वस्त करने की निन्दा-भर्त्सना नहीं की गई है लोग ऐसे ही अन्य स्थानों को नष्ट करने से क्यों हिचकेंगे? हम पिछले वर्षों में देख चुके हैं कि पूजा-स्थलों की स्थिति अपरिवर्तित रखने सम्बन्धी 1993 का कानून निष्प्रभावी ही रहा है।
     इतिहास में जो कुछ घटा, घट चुका। उसे बदला नहीं जा सकता। पर जो भी हुआ, हम उसे उसकी समग्रता में समझना तो सीख ही सकते हैं और चीज़ों को भरोसेमन्द साक्ष्यों के आधार पर परखने की कोशिश तो कर ही सकते हैं। समकालीन राजनीति का औचित्य सिद्ध करने के लिये हम अतीत को बदल नहीं सकते। इस निर्णय ने इतिहास के प्रति सम्मान के भाव को मिटाने का काम किया है और इतिहास की जगह धार्मिक आस्था को प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया है। सच्चा समझौता तो इस भरोसे के आधार पर ही हो सकता है कि इस देश का कानून आस्था और विश्वास पर नहीं बल्कि ठोस सबूतों के आधार पर काम करता है।          

रविवार, 30 मई 2010

हिन्दुत्ववादी आतंकवाद का पर्दाफ़ाश

संपादकीय, २२ मई,२०१०. ई पी डब्ल्यू

हिन्दुत्ववादी आतंकवाद का पर्दाफ़ाश

साम्प्रदायिक दुराग्रहों ने आतंकवाद के विरुद्ध हमारे संघर्ष को कमज़ोर कर दिया है

मालेगांव में सितम्बर २००६ में हुए बम धमाकों में जब एक स्थानीय मस्जिद के बाहर जुमे की नमाज़ अदा करने के लिए एकत्रित लोगों में से ४० मारे गए और उनसे भी अधिक घायल हुए तो पहली गिरफ्तारियां कुछ मुस्लिम व्यक्तियों की हुईं जिन्हें लश्कर-ए-तैयबा (LET) और और स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ इंडिया (SIMI) से जुड़ा हुआ बताया गया. एक साल भी नहीं बीता था कि मई २००७ में हैदराबाद की मक्का मस्जिद में एक वैसा ही बम विस्फोट हुआ जिसमें ९ लोग मारे गए. पुलिस के अनुसार वे "परिष्कृत" बम थे जिनका विस्फोट बांग्लादेश स्थित सेलफोन से किया गया था और मुख्य अभियुक्त हरक़त-उल-जिहाद अल इस्लामी (HUJI) से जुड़े एक मुस्लिम व्यक्ति को बताया गया. पुलिस ने मनमाने तरीके से शहर के कुछ मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया और उन्हें यंत्रणा देकर उनसे "अपराध" की स्वीकारोक्ति भी करा ली. ६ महीने बाद ही राजस्थान की अजमेर शरीफ दरगाह में रमज़ान के आख़िरी जुमे के दिन हुए धमाके के लिए एक बार फिर "जिहादी आतंकवादी" ज़िम्मेदार बताये गए.

महाराष्ट्र पुलिस के आतंकवाद निरोधक दस्ते (ATS) के मुखिया हेमंत करकरे की सभी उपलब्ध सुरागों की तफ्तीश करने की सहज-सरल परन्तु साहसपूर्ण कार्यवाही के चलते मालेगांव बम धमाकों से हिन्दुत्ववादी गुटों का सम्बन्ध उजागर हो गया. इस अकेली कार्यवाही के बिना ऐसे ही अन्य सारे सम्बन्ध शायद हमारे सुरक्षा प्रतिष्ठान द्वारा परोसे गए झूठों और अर्धसत्यों के पीछे दबे रह जाते. जैसा कि अब सभी जानते हैं इस हमले की योजना "अभिनव भारत" नामके एक गुट नें बनाई थी. इस गुट में कुछ धार्मिक हस्तियों के अतिरिक्त भारतीय थलसेना का एक सेवारत अधिकारी भी शामिल है. नांदेड, भोपाल, कानपुर और गोवा में बम बनाने के मामलों में हिन्दुत्ववादी गुटों के शामिल होने के और भी मामले खुले हैं. इनमें से अधिकाँश बजरंग दल से जुड़े हैं जो आर एस एस का ही एक अनुषांगिक संगठन है. बम धमाकों की श्रंखला से आर एस एस और इसके अनुषांगिक संगठनों और व्यक्तियों का सम्बन्ध अब जगजाहिर है. और यह उस दूसरे और पुख्ता सबूतों के अतिरिक्त है जो बीसियों साम्प्रदायिक नरसंहारों में इस भयावह संगठन की संलिप्तता की पुष्टि करते हैं; गुजरात में २००२ में हुआ दंगा जिनका नवीनतम और सबसे बड़ा उदाहरण है.

भारत में धार्मिक कट्टरवाद से उपजे आतंक का अगर कोई एक स्रोत है तो वो है आर एस एस. इसके छोटे भाई-बंधू इस्लामी, सिख या ईसाई कट्टरपंथी भी यद्यपि अपने-अपने तरीके से खतरनाक हैं परन्तु वे आर एस एस व इससे जुड़े संगठनों व व्यक्तियों- के संगठनात्मक संजाल,आर्थिक मजबूती, और राजनीतिक वैधता के मुकाबले में कहीं नहीं ठहरते. और जो भी हो भारत का सबसे बड़ा विपक्षी दल भी आर एस एस की शत प्रतिशत अधीनस्थ शाखा ही तो है; और इस "परिवार" की उग्र साम्प्रदायिक राजनीति ने देश में ऐसा राजनीतिक माहौल बना दिया है जिसमें कोई भी आतंकवादी कृत्य सबूतों की परवाह किये बिना मुस्लिमों से जोड़ दिया जाता है.

इसके बावजूद, मुस्लिम समुदायों के बीच इस्लामी कट्टरपंथ का उदय एक गंभीर मसला है.खुद मुस्लिमों पर भी इसके प्रतिगामी सामाजिक और राजनीतिक प्रभावों के अतिरिक्त इसके और भी घातक परिणाम संभावित हैं और इसके विरुद्ध जुझारू संघर्ष चलाने की आवश्यकता है. इस्लामी कट्टरपंथियों ने न केवल भारत अपितु पूरी दुनिया में आतंकवादी संगठनों की स्थापना और पालन-पोषण किया है और हिंसक कार्यवाहियां की हैं. इन में से किसी भी तथ्य को न तो नकारा जा सकता है न ही इस्लामी कट्टरपंथ और आतंकवाद के विरुद्ध चौकसी में ढील दी जा सकती है.

फिर भी, यह तो अब बिलकुल स्पष्ट हो चुका है कि हमारी सुरक्षा एजेंसियां, सरकारी संस्थाएं, और मंत्रालय विशेषरूप से गृहमंत्रालय साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह से बुरी तरह ग्रस्त हैं. ऊपर उद्धृत सभी मामलों में, और अन्य भी कई मामलों में सारे फोरेंसिक और परिस्थितिजन्य साक्ष्य हिन्दुत्ववादी गुटों की सांठ-गाँठ की और संकेत करते पाए गए. फिर भी सारे साक्ष्यों की उपेक्षा करते हुए और बिलकुल साफ़-साफ़ सुरागों को दरकिनार करते हुए उन्होंने जिहादी आतंकवाद की सांठ-गांठ की कहानियाँ गढ़ीं ; मनमाने तरीके से कुछ मुस्लिम पुरुषों (और कुछ महिलाओं को भी) उठा कर उन्हें तब तक यंत्रणा देते रहे जब तक की उन्होंने अपना "अपराध" स्वीकार नहीं कर लिया और अंत में केस हल करने में सफलता का दावा करने लगे. अभी हाल में ही इसी जनवरी में ही जबकि मालेगांव से हिन्दुत्ववादी आतंक के तार जुड़े होने की पुष्टि हो चुकी थी और राजस्थान पुलिस अजमेर धमाके के अभियुक्तों से मक्का मस्जिद में रखे गए बमों से उनके सम्बन्ध के बारे में पूछताछ शुरू कर चुकी थी; उसी समय हैदराबाद पुलिस खुशी-खुशी कुछ मुस्लिमों को गिरफ़्तार कर रही थी जिनके बारे में उसका दावा था कि उनका सम्बन्ध २००७ में मक्का मस्जिद में हुए धमाकों से था. सोहराबुद्दीन शेख़, उसकी पत्नी, इशरत जहां, और उसके मित्रों की ह्त्या में गुजरात, राजस्थान, और आंध्र प्रदेश पुलिस की मिलीभगत अब पूरी तरह से साबित हो चुकी है. दिल्ली के बटाला हाउस मुठभेड़ जैसे मामलों में भी पुलिस के साम्प्रदायिक दुराग्रह और गलत कारनामों के प्राथमिक साक्ष्य भी सामने आ चुके हैं. दुर्भाग्य से ऐसे मामलों की सूची जिनमें पुलिस और सुरक्षा प्रतिष्ठान के साम्प्रदायिक दुराग्रह के प्रमाण मिलते हैं इतनी लम्बी है कि कई पोथियां भरी जा सकती हैं.

यद्यपि जाति और लिंग संबंधी पूर्वाग्रहों और भेदभावों को पहचान कर उनके समाधान कि दिशा में कुछ प्रयास किये गए हैं, धार्मिक अल्पसंख्यकों-विशेषकर मुस्लिमों के विरुद्ध भेदभाव और पूर्वाग्रहों को पहचान कर उन्हें निर्मूल करने के बारे में एक खास तरह की जिद और हठधर्मी ही देखने में आती है. यू पी ए गठबंधन की मौजूदा सरकार ने सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्टों के प्रकाश में कुछ स्वागत योग्य कदम उठाये तो हैं. इनके माध्यम से भारत के मुस्लिमों के विरुद्ध संरचनात्मक भेदभाव और पूर्वाग्रहों और उनके निर्मूलन के बारे में सवाल भी उठने लगे हैं.ये भी सच है कि हिन्दुत्ववादी गुटों और बम धमाकों का आपराधिक रिश्ते का खुलासा भी इसी गठबंधन के शासनकाल में हुआ है. फिर भी इतना भर पर्याप्त नहीं है; हमारे पूरे सुरक्षा प्रतिष्ठान को साम्प्रदायिक वायरस से मुक्त कराने के लिए अविलम्ब कदम उठाए जाने की आवश्यकता है. पर ये अभी देखना है कि वर्तमान गृहमंत्री, पी चिदम्बरम खुद को इस कार्य के लिए सक्षम सिद्ध कर पाते हैं या नहीं और कांग्रेस पार्टी प्रशासन और राज्य के ढाँचे में घर बना चुके हिंदुत्व से दो-दो हाथ करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति जुटा पाती है या नहीं.

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

देशभक्ति की बाढ़

     राष्ट्रीय एकता और देशभक्ति  की बाढ़ आ गई है देश में. कैसा अद्भुत दृश्य है!
 भाजपा,कांग्रेस,और हमारे वामपंथी- सभी एक ही सुर में हुआं-हुआं कर रहे हैं.
 भाजपा वाले ठहरे हिंदुत्व के रक्षक. उन्हें तो वेदांतवादी चिदम्बरमके साथ आना
 ही था. व्यवस्था को चुनौती देने वाले शम्बूक का सर तो मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने 
भी काटा ही था. अब चिदंबरम भी यही करें तो इसमें ग़लत क्या है? अरे वनवासी
 तो वो है जो केवट की तरह चरण धोये या शबरी की तरह बेर बीन-बीन कर अर्पित
 करे.चलो माना अब बेर नहीं मिलते. तो ठीक है-तेंदू पत्ता अर्पित करते रहो. मगर
 ये क्या? 'भुक्खड़ के हाथों में ये बंदूक कहां से आई!' अब तो कुछ करना ही पड़ेगा.
     रविशंकरप्रसाद ने कितनी अच्छी बात कही! माओवादियों को ही नहीं उनके वकीलों को भी सबक सिखाना चाहिए. ये अरुंधती राय को देखिये. हम तो समझते थे अपनी ही बिरादरी की है. अपने उपन्यास में 'कम्युनिस्टों' की क्या ख़ूब पोल खोली है. पर वो तो मोटर साइकिल पर लटक के पहुँच गई उन जंगलियों के बीच. अरे कोई तरीका है? आप बुद्धिजीवी हैं तो बुद्धिजीवी की तरह रहिये. गूगल है; विकिपीडिया है.और भी तमाम तरीके हैं माओवादियों के बारे में जानने के. अरे हमारे संवेदनशील कविहृदय विश्वरंजन जी का साक्षात्कार ले लेती.सब समझा देते वहीं बैठे-बैठे. पर नहीं. वो तो सीधे जंगलों में ही पहुँच गई.
     और हमारे वामपंथियों को तो लोग बेकार में ही ताना दे रहे हैं कि भाजपा के साथ खड़े हैं 
उनकी तो आज़माई हुई पद्धति है- ठोस परिस्थितियों का ठोस विश्लेषण। अब परिस्थितियां 
ही ऐसी हैं कि भाजपा के और उनके सुख-दुःख साझे हो गये हैं तो क्या किया जाये? बंगाल में
यही उत्पाती न जिन्दल को आने दे रहे हैं न सलीम को। टाटा को तो निकाल ही दिया। कहीं
वेदांत के पीछे पड़े हैं तो कहीं एस्सार के। तो साझे दुश्मन के सामने भाजपा या कांग्रेस से हाथ 
मिला भी लिया तो कौन सी प्रलय हो गई? अरे उनसे तो अपना 'फ़्रेण्डली मैच' है। बचे रहे तो 
सारी ज़िन्दगी खेलते रहेंगे। पर इन माओवादियों के चक्कर में अगर वनवासी ही नहीं और 
जनता भी आ गई तो फिर तो न हम रहेंगे न मैच। इसलिये पहले इनसे निबटना ज़रूरी है। 
    
     चिदंबरम जी ने सी आर पी के जवानों को भेजा था जंगलों में कि माओवादी और वनवासी
जहां भी मिलें उन्हें माला पहनाओ और प्रेम, करुणा और अहिंसा से उनका मन जीतो. और
माओवादियों ने हल्ला मचा दिया कि ये तो वनवासियों को जंगल से खदेड़ने आये हैं . और इतना
ही नहीं हथियार लेकर टूट पड़े उन पर. ये कोई तरीका है? अरे हथियार और हिंसा तो सरकार को
ही शोभा देते हैं. वनवासी,आदिवासी,मजदूर,व किसान- इनके लिए तो गांधी जी बता ही गये हैं
रास्ता. अरे भाई उससे मन न भरे तो थोडा-बहुत जिंदाबाद-मुर्दाबाद कर लो. पर ये क्या कि
हथियार ही उठा लिए! राम-राम. घोर कलियुग आ गया लगता है. चिदम्बरम जी! दमन करो हम तुम्हारे साथ हैं.

मंगलवार, 9 मार्च 2010

तसलीमा नसरीन और मक़बूल फ़िदा हुसैन

 तसलीमा नसरीन एक बार फिर चरचा में हैं। इस बार मुद्दा है कर्नाटक के किसी अख़बार में प्रकाशित उनके किसी लेख का कथित अनुवाद। कथित इस लिये क्योंकि स्वयं तसलीमा ने उक्त अख़बार के लिये ऐसा कोई लेख लिखने से इन्कार किया है। उन्होंने लिखा या नहीं यह एक अलग जांच का विषय हो सकता है। परन्तु उस लेख के प्रकाशित होते ही दो बातें हुईं। एक ओर तो “इस्लाम” के तथाकथित रक्षक सड़क पर उतर कर तोड़-फोड़ में संलग्न हो गये तो दूसरी ओर धर्मनिरपेक्षता और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के तथाकथित ठेकेदार लगभग हमेशा की तरह अपने-अपने बिलों में दुबके नज़र आये।राज्यसभा में वृन्दा करात मक़बूल फ़िदा हुसैन के पक्ष में तो बोलीं पर तसलीमा नसरीन के बारे में चुप्पी साध गईं। दूसरी ओर हुसैन की विरोधी भाजपा के बलबीर पुंज ने सिर्फ़ तसलीमा का मामला उठाया।
 पर प्रश्न तसलीमा या हुसैन का नहीं है। प्रश्न ये है कि धार्मिक फ़ासिस्टों को लोगों के लोकतान्त्रिक अधिकारों के हनन का लाइसेंस किसने दिया। कालिदास के कुमार संभव से लेकर खजुराहो के मन्दिरों तक तथाकथित “अश्लीलता” बिखरी पड़ी है। और इतना पीछे जाने की भी ज़रूरत क्या है? सभी शिव-मन्दिरों में शिवलिंग पूजा जाता है। पर वहां कहीं भी आस्था आहत नहीं होती। ग़रीबी-रेखा से नीचे रहने वालों में हिंदू भी हैं और मुस्लिम भी। जब केन्द्र सरकार उनके लिये सस्ते अनाज का मासिक आवंटन 35 किलो से घटा कर 25 किलो कर देती है तब भी किसी की भावनायें आहत नहीं होतीं। इसी तरह सच्चर कमीशन की रिपोर्ट में देश के अधिकांश मुस्लिमों की दयनीय आर्थिक-सामाजिक दशा के प्रमाण मिलने से भी “इस्लाम” ख़तरे में नहीं पड़ता। इस्लाम के ये तथाकथित ठेकेदार उस समय कहां दुबक गये थे जब गुजरात में निरीह मुस्लिमों का नरसंहार हो रहा था?  हुसैन कैसे चित्र बनाते हैं या कैसे चित्र बनायें इस बात का फ़ैसला चित्रकला मर्मज्ञों पर क्यों नहीं छोड़ा जा सकता? 95 साल के हुसैन को लगातार मिलती धमकियों के कारण अन्तोगत्वा अपना देश छोड़ने पर क्यों मजबूर होना पड़ता है? वो भी तब जब सर्वोच्च न्यायालय उन्हें अश्लीलता के आरोप से बरी कर चुका है। इसी तरह तसलीमा नसरीन का लिखा अगर किसी को ग़लत लगता है तो उसी तरह लिख कर उनकी आलोचना/निन्दा/भर्त्सना क्यों नहीं की जा सकती? पर कला, साहित्य, संस्कृति फ़ासिस्टों के लिये आतँक फैलाने के बहाने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं हैं। अभी भी समय है कि इस देश की मेधा-मनीषा आसन्न ख़तरे को पहचान कर उसके प्रतिकार के उपाय करे। 

शनिवार, 10 अक्टूबर 2009

प्रेत की वापसी

प्रेत फिर दिखने लगा है। उस सनकी दढ़ियल ने 150 साल पहले एक प्रेत के आंतक की घोषणा की थी।और तभी से सारे सयाने और ओझा मिर्च की धूनी और नीम के झाड़ू से लेकर बड़े-बड़े तोप-तलवार और बम तक ले कर उस प्रेत के विनाश  के प्रयास में जुटे हुए हैं। कामयाबी नहीं मिली तो मन्त्रों और झाड़-फूंक का सहारा लिया गया। और एक बार तो लगा कि जैसे प्रेत वापस गया बोतल में। दुनिया भर के अघोरी और प्रेत-पूजक दावे करते थे कि प्रेत तो सामाजिक इतिहास का हिस्सा है और उसे ऐतिहासिक  प्रक्रिया से अलग नहीं किया जा सकता। सयानों ने उपाय निकाला। उन्होंने इतिहास के ही अन्त की घोषणा कर दी। न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी।

कुछ दिन अमन-चैन भी  रहा(यूं न था मैंने फ़क़त चाहा था यूं हो जाये) प्रेतोपासकों में से कुछ तो बाकायदा राम-राम जपने भी लगे। जिन्होंने नहीं भी जपा उन्होंने भी आंगन में तुलसी का पौधा तो रोप ही लिया और सुबह शाम उस पर जल चढ़ाने लगे। सुग्रीव और विभीषण के राजतिलक हुए; उन्हें पुरस्कृत भी किया गया। कुछ अन्य भी थे जो देखने में तो लंकेश-मित्र बालि जैसे लगते थे पर जब भी अवसर आया उन्होंने सीना चीर कर दिखा दिया कि उनके हृदय में तो राम ही बसते हैं और उनकी गदा अगर उठेगी तो राक्षसों के विरुद्ध वरना तो वे रामजी के फ़लाहारी चाकर मात्र हैं। लगने लगा अब तो मोरचा फ़तह हो गया। लंका मे राम-राज आ गया।

 पर ये क्या? प्रेत-माया तो इस बीच और भी सशक्त हो गई। प्रेतोपासक राक्षस सिर्फ़ लंका में ही नहीं थे। वे तो हर तरफ़ बिखरे हुए थे। सारी दुनिया में ॠषि-मुनियों के यज्ञों में बाधा उत्पन्न करने लगे। विष्णु का अवतार कहलाता था राजा। बेचारे की वो दशा हुई कि घर का रहा न घाट का। आर्यावर्त्त में तो असुरों ने रामजी के विरुद्ध हल्ला ही बोल दिया। दीन-हीन अयोध्यावासियों के जत्थे के जत्थे राक्षसों की सेना में भरती होने लगे। दशा इतनी बिगड़ गई कि महाबली हनुमान को भी अपनी रक्षा के लिये राजसैनिकों से मदद मांगनी पड़ी।

 स्थिति जटिल होती जा रही है। रामजी भी क्या करें। ये त्रेता नहीं कलियुग है। प्रेतोपासक राक्षसों की सँख्या बढ़ती जा रही है। त्रेता में तो वानरों में सुग्रीव और राक्षसों मे विभीषण ही मिलते थे। अब मामला बहुत आगे बढ़ चुका है। ॠषि-मुनियों और राज सैनिकों में से भी कितने राक्षसों से मिले हुए हैं, कुछ पता नहीं चलता। बनवासी अहिल्या, केवट और शबरी दर्शन करके गदगद  नहीं होते बल्कि देखते ही हथियार लेकर मारने दौड़ते हैं। शम्बूकों ने भी वेद पढ़कर लोगों को भड़काना शुरू कर दिया है। उनका सर काटना भी अब सहज नहीं रहा। और काट भी दें तो एक शम्बूक की जगह हज़ार निकल आते हैं।

त्रेता में भय बिनु होय न प्रीत बोलने वाले राम जी आजकल अकेले में

      अब मैं काह करूं कित जाऊं गुनगुनाते पाये जाते हैं।   

शनिवार, 7 फ़रवरी 2009

बाढ़ की सम्भावनायें सामने हैं

बाढ़ की सम्भावनायें सामने हैं

और नदियों के किनारे घर बने हैं।

कई दिनों से दुष्यन्त की ये पंक्तियां मन में घुमड़ रही हैं। और बदली जब घुमड़ेगी तो देर-सबेर बरसेगी भी ज़रूर। लगता है आज बारिश होगी।

मंगलौर की दुर्घटना को ले कर द्र्श्य मीडिया में और ब्लॉग जगत में भी ख़ूब हलचल मची हुई है। हमारे टी वी चैनेल तो अधिकतम फ़ुटेज श्रीराम सेने और उसके कार्यकर्ताओं को देते हुए और उनकी आलोचना के बहाने से ही सही उन्हें इतना प्रचार दे रहे हैं जिसकी स्वयम उन्होंने भी कल्पना नहीं की होगी। कुछ दिन पहले मुम्बई में हुए आतंकवादी हमले के दौरान भी यही देखने में आया था। ताज होटल से बच कर निकलती एक बदहवास, डरी और घबराई हुई महिला के पीछे एक पत्रकार कैमरा-माइक लेकर पड़ गया और उससे कुछ मसालेदार न्यूज़ उगलवाने के प्रयास में काफ़ी देर तक लगा रहा। उस आतंक को इतना प्रचार-प्रसार इस मीडिया के माध्यम से मिला कि शायद उसके सूत्रधारों के सारे मनोरथ सफ़ल हो गये होंगे।

परन्तु इस आलेख का उद्देश्य मीडिया पर हमला करना नहीं है जो अक्सर ही लोकतान्त्रिक मूल्यों की दुहाई देते-देते फ़ासिस्ट प्रतिगामी शक्तियों के हाथों का चेतन या अचेतन मोहरा बन जाता है। मन्तव्य है मंगलौर, मुम्बई जैसी घटनाओं और हादसों के निहितार्थों की ओर संकेत करना।

ज़रा एक निगाह डालें ऐसी घटनाओं के पात्रों की वर्गीय प्रष्ठभूमि पर। अधिकांश मामलों में हमलावर बेरोज़गार/अर्द्ध बेरोज़गार लुम्पेनाइज़्ड नौजवान या अधेड़ होते हैं जो इस सामाजिक ढाँचे में अपने लिये एक स्पेस बनाने का प्रयास कर रहे होते हैं या बना चुके होते हैं और उसकी निरन्तरता सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहे होते हैं। मंगलौर के श्रीराम सेने के कार्यकर्ता हों, अयोध्या-काण्ड के कारसेवक,अहमदाबाद और उड़ीसा के हत्यारे जनसमूह या तालिबानी आतंकवादी कसाब और अन्य इन सभी की सामाजिक-आर्थिक प्रष्ठभूमि एक जैसी ही होती हैसंस्कृति, हिन्दुत्व, इस्लाम या ऐसे ही अन्य नारे भले ही अलग-अलग या परस्पर विरोधी भी नज़र आयें पर नारों के नाम पर मारपीट/मारकाट करने वालों की प्रष्ठभूमि यही होती है। हिटलर के ब्राउन शर्टस गिरोहों में भी यही लोग शामिल हुआ करते थे।

इतिहास गवाह है कि यदि समकालीन सामाजिक व्यवस्था और संस्थाओं से जनता का मोह-भंग हो जाता है तो समाज एक दोराहे पर आकर खड़ा हो जाता है।एक रास्ता जाता है जनवादी मानवीय सामाजिक व्यवस्था की स्थापना की ओर। पर इस रास्ते पर आगे बढ़ सकने के लिये आवश्यक है समाज में प्रगतिकामी जनवादी तत्व पर्याप्त रूप से सचेतन, सशक्त, समर्थ और सक्रिय हों। तभी व्यवस्था के अन्तर्निहित विरोधाभासों से उपजे जनाक्रोश को एक क्रान्तिकारी, प्रगतिशील दिशा दी जा सकती है। दूसरा रास्ता ख़तरनाक है। यदि जनवादी प्रगतिकामी शक्तियाँ अनुपस्थित,अक्षम अशक्त या निष्क्रिय होती हैं तो सामाजिक शून्य को भरने का काम करती हैं जनविरोधी, अमानवीय फ़ासीवादी शक्तियाँ।

पहले रास्ते का उदाहरण क्यूबा में देखा जा सकता है जहां जनवादी क्रान्तिकारी शक्तियों ने साम्राज्यवादी कठपुतले बतिस्ता को हटा कर राजसत्ता पर कब्ज़ा कर लिया और पूरे देश और समाज को मानव-मुक्ति के पथ पर अग्रसर कर दिया। कुछ पहले यही काम चीन में भी हो चुका था।दूसरे ख़तरनाक विकल्प के उदाहरण भी कई हैं। हिटलर का जर्मनी, फ़्रैंको का स्पेन, पिनोशे का चिली, इण्डोनेशिया……यह सूची और भी लम्बी हो सकती है।

उपरोक्त ऐतिहासिक अनुभवों के प्रकाश में भारत के समकालीन सामाजिक-राजनैतिक

परिद्रश्य पर एक निगाह डालना असंगत न होगा।

वर्तमान सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्था और संस्थाओं से मोहभंग के लक्षण दिन-प्रतिदिन और भी मुखर होते जा रहे हैं। बेरोजगारों की बढ़ती संख्या नौजवानों को या तो धार्मिक उन्माद की ओर धकेल रही है या सीधे-सीधे अपराध की ओर। काँवरियों, जागरणो,धार्मिक महन्तों के प्रवचनों में कुछ वर्ष पहले तक अधेड़-अवकाश प्राप्त बुज़ुर्गों का बहुमत होता था। अब एक बड़ी संख्या नई उम्र के नौजवानों की होती है। इनमें से ही एक हिस्सा बजरंगदल, श्रीराम सेने, जैसे तथाकथित धार्मिक-सांस्कृतिक संगठनों की ओर मुड़ रहा है और दूसरा हिस्सा संगठित अपराध और आतंकवादी गतिविधियों की ओर।

क्रांति के द्वारा व्यवस्था परिवर्तन की बातें करने वाले दल और संगठन भी जाने-अनजाने इसी व्यवस्था का एक हिस्सा बन चुके हैं और उनकी सारी लड़ाई इसी व्यवस्था में अपने लिये एक कोना सुरक्षित बनाए रखने के प्रयासों तक सीमित रह गई है। क्रांति की कसमें खाने वाले कम्युनिस्ट दलों को भी उनके आचरण के चलते अधिक से अधिक सामाजिक जनवादी ही कहा जा सकता है जो अर्थवादी लोकलुभावन नारे जोर-शोर से लगाते रहते हैं और जिन्हें भृष्टतम घोर प्रतिक्रियावादी शक्तियों के साथ उठने-बैठने में कोई भी संकोच नहीं होता यदि उन्हें बैकसीट ड्राइविंग के सुख के साथ कुछ पद्मभूषण, पद्मविभूषण जैसे लॉलीपॉप मिलते रहें। क्रांति और सामाजिक परिवर्तन तो शायद उनके एजेण्डे से ही ग़ायब हो चुके हैं।

इस परिदृश्य में सामाजिक सरोकारों वाले सचेतन प्रगतिकामी लोगों पर एक बड़ी ज़िम्मेदारी आ जाती है कि समाज को प्रतिक्रियावाद की खाई में गिरने से बचाते हुए उसके ऐतिहासिक गन्तव्य की ओर अग्रसर करने में प्रभावी भूमिका निभाई जाय। यह कार्य एक दिन में किसी एक व्यक्ति के द्वारा नहीं किया जा सकता। मेरा विश्वास है कि एक बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो वर्तमान घटनाक्रम से असन्तुष्ट हैं और समाज को और बेहतर, और अधिक जनवादी और मानवीय देखना चाहते हैं। ये सभी लोग अपने-अपने तरीके से इस दिशा में प्रयास भी कर रहे हैं। यदि इन वैयक्तिक प्रयासों को सामूहिक, संगठित, और सुनियोजित किया जा सके तो निश्चय ही एक शोषण-विहीन समाज का लक्ष्य कुछ और करीब आ सकेगा। यह आलेख भी इसी दिशा में एक छोटा सा कदम है।